महाराणा प्रताप 2. राज तिलक से पहले

MAHARANA PRATAP महाराणा प्रताप
MAHARANA PRATAP महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप राज तिलक से पहले

MAHARANA PRATAP महाराणा प्रताप
MAHARANA PRATAP महाराणा प्रताप

जब प्रताप का राजतिलक हुआ तो उनकी आयु 31 वर्ष से अधिक थी। महाराणा उदयसिंह के समय में मेवाड़ के इतिहास में जो उतार-चढ़ाव आए थे, उनका अनुभव प्रताप ने तीन वर्ष की आयु से ही किया था। यद्यपि मेवाड़ के उपलब्ध ऐतिहासिक वृत्तांतों में उन दिनों के प्रताप का उल्लेख ज्यादा नहीं मिलता, उदयसिंह के समय में मेवाड़ के इतिहास में जो दो सबसे बड़े निर्णय हुए उनमें प्रताप का भी हाथ था।

16 मार्च 1559 को प्रताप के ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह का जन्म हुआ। महाराणा उदयसिंह पोते के जन्म पर आनंद विभोर हो गए। तरह तरह के उत्सव मनाए गए और राज्यदेवता श्री एकलिंग जी के दर्शन का विशेष आयोजन हुआ। उदयसिंह चित्तौड़ से अपने प्रमुख संबंधियों तथा सामंतों सहित एकलिंग जी पहुंचे और वहां पूजा करने के बाद, आहड़ गांव की ओर सब लोग शिकार के लिए गए।

 

चित्तौड़ :

राजधानी को चित्तौड़ से हटाकर कहीं दूसरी जगह ले जाने की बात तो पहले से ही सोची जा रही थी, विशेषकर चित्तौड़ पर शेरशाह के आक्रमण के समय से, क्योंकि घेरेबंदी के बाद, एकांत पहाड़ पर स्थित उस दुर्ग की, सुरक्षा बहुत कठिन हो जाती थी। आसपास के रास्ते बंद हो जाने पर राजधानी शेष सारे राज्य से कट जाती थी। राजधानी में घिरे लोगों को रसद पहुंचाना भी संभव नहीं होता था। आहड़ के पास, पहाड़ियों से घिरे, सुरम्य मैदान को देखकर उदयसिंह के मन में सहसा आया कि यहीं नई राजधानी बनाई जा सकती है। उसने तत्काल अपने सब सामंतों और वरिष्ठ अधिकारियों से परामर्श किया कि पहाड़ी से घिरे उस स्थल पर राजधानी बनाने से रसद के लिए कठिनाई होगी या नहीं । उन्होंने यह फैसला किया कि कठिनाई नहीं होगी और हमला होने पर, पर्वतीय युद्ध का भी अच्छा अवसर मिलेगा। सब उपस्थित लोगों ने महाराज का समर्थन किया और उस सलाह को ‘अच्छी और कामयाबी हासिल करने वाली’ बताया। प्रताप भी उसके समर्थकों में थे। इस तरह मेवाड़ की राजधानी नई जगह बनाने का निश्चय और उसके लिए जगह का चुनाव प्रताप के पुत्र के जन्म-समारोह पर आयोजित उस आखेट-अभियान में हुआ था।

मेवाड़ :

दूसरा निर्णय अत्यंत गंभीर और असाधारण था। 1567 की बात है। तब प्रताप लगभग सत्ताईस वर्ष के थे। चित्तौड़ यह समाचार पहुंचा कि अकबर ने पूरी तैयारी के साथ मेवाड़ की ओर कूच कर दिया है। उदयसिंह को बताया गया कि बादशाह का चित्तौड़ पर चढ़ाई करने का इरादा है।उदयसिंह ने अपने सामंतों से परामर्श किया कठिन घड़ी थी, कठोर निर्णय  करने थे . मेवाड़ पर कई बार हमले हो चुके थे लेकिन अब कितना कठिन होगा यह सभी जानते थे। अतीत के अनुभव और भविष्य की आशंकाओं से भरे सब लोग चित्तौड़ की रक्षा की योजना बना प्रांगण में इकट्ठे हुए। सामंतों ने कहा कि पिछली लड़ाइयों में जान हानि हो जाने के कारण मेवाड़ की शक्ति कम हो गई है। अकला पर और भी नुकसान अवश्य होगा। इसलिए महाराणा को अपने सहित चित्तौड़ छोड़कर मेवाड़ के पर्वतीय प्रदेश में चला जाना को कोई भी वीर राजपूत स्वीकार नहीं कर सकता था।

उदयसिंह  :

उदयसिंह ने कहा और रानियों को अवश्य सुरक्षित स्थान पर भेज दिया जाय; लेकिन व की रक्षा के लिए वहीं रहेंगे। उस पर बड़े राजकुमार प्रताप ने निवेदन महाराणा को तो चित्तौड़ में रहकर अपने को संकट में नहीं डालना चाहि प्रदेश में पहुंचने पर किले के बाहर से युद्ध जारी रखा जा सकता है। निजी वह स्वयं उपस्थित रहेगा और उसकी रक्षा का भार अपने नौजवान कंधों पर उठा प्रताप ने बताया कि मेवाड़ में पहले से इसी प्रकार की परंपरा रही है, लेकिन मेवार के सरदारों ने महाराणा और महाराजकुमार दोनों की सलाह नहीं मानी, और जोर देकर कहा कि महाराणा को राजकुमारों और रानियों सहित ही चित्तौड़ छोड़कर चले जाना चाहिए, क्योंकि पीछे भी तो आराम से राज्य करने का समय नहीं है। ‘मर-मार कर हमें अपना बदला और राज्य लेना होगा।’ यही फैसला हुआ और उदयसिंह किले की रक्षा का भार (जयमल के नेतृत्व में) आठ हजार राजपूतों को सौंपकर, कुछ सामंतों और अपने परिवार सहित मेवाड़ के दक्षिण पहाड़ में चले गए। उदयसिंह को इस निर्णय से बहुते संताप हुआ।

कुछ इतिहासकारों ने, विशेषता कर्नल जेम्स टॉड और विन्सेन्ट स्मिथ, लॉरेन्स बिनयन आदि ने, उदयसिंह की, उसके इस निर्णय के लिए, बहुत भर्त्सना की है। इसे उसकी कमजोरी का प्रदर्शन कहा है। उन्होंने लिखा है कि मेवाड़ के शासक में राजा के गुणों का सर्वथा अभाव होने के कारण मेवाड के बरे दिन आ गए या लेकिन बाद के इतिहासकारों ने उदयसिंह को धिक्कार से मक्ति दी-वे इस न की आवश्यकता का अनुभव करने लगे।

यह और भी ध्यान देने योग्य बात है कि किसी समकालीन इतिहास ने उदयसिंह की आलोचना नहीं की है, न किसी ने उसको देशद्रोही या कायर कहा  है।

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जैसा कि ऊपर के विवरण से स्पष्ट है, यह निर्णय उदयसिंह का नहीं था डा. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि उदयसिंह ने इस सलाह का स्वागत नहीं किया था-उसने तो उस परिणाम के आगे सिर झुकाया जो होकर ही रहता। उसने अपने सामंतों के अभिमत को स्वीकार किया-जरा से मतभेद से भी स्थिति बहत बिगड जाती। यह आवश्यक था कि शत्रु का मुकाबला किले से और उसके बाहर से संयुक्त मोर्चे द्वारा किया जाए। इस प्रकार राजनीतिक कारणों से मजबूर होकर राणा उदयसिंह ने चित्तौड़गढ़ से विदा ली । श्री शेलट ने और स्पष्ट किया है कि सिसोदिया कुल का नेतृत्व जिसके ऊपर था उसके लिए यह अवश्य ही एक सुखदायी निर्णय था। उदयसिंह ने अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की चिंता छोड़कर राज्य के हितों को महत्व दिया ।

अब दो मोर्चे संभालने थे-एक किले के भीतर, दूसरा किले के बाहर। एक ओर किले की रक्षा का पूरा प्रयत्न करना था दूसरी ओर आक्रमणकारियों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध जारी रखकर तथा रसद पहुंचाने के रास्तों को बंद कर या काटकर इस तरह क्षत-विक्षत कर देना था कि वे राणा को मारकर या पकड़कर सारे मेवाड़ को परास्त न कर सकें। मेवाड़ की इस रणनीति के प्रत्युत्तर में ही अकबर को, स्वयं चित्तौड़ की घेरेबंदी में लगे हुए होने पर भी, उदयसिंह का पीछा करने के लिए अपने विश्वस्त सेनापति हुसेन कुली खां को भेजना पड़ा। हुसेन कुलीखां सफल नहीं हुआ, राणा पकड़ा नहीं जा सका। लेकिन अकबर ने चित्तौड़ जीत लिया।

__ इन निर्णयों से प्रताप का जो संबंध था उसको समझ लेना आवश्यक है। इनके लिए चाहे उदयसिंह को उत्तरदायी ठहराया जाए लेकिन उसमें थोड़ा-बहुत हाथ प्रताप का भी था। उदयसिंह गद्दी पर था, लेकिन प्रताप उसका वयस्क उत्तराधिकारी था और निर्णय के समय मौजद भी था। वह भी परिस्थितियों से उसी प्रकार बंधा था जिस प्रकार उसका पिता मेवाड़ का राणा, बंधा था। मेवाड़ में यह पुरानी परंपरा चल गई थी कि महाराणा को महत्वपर्ण निर्णय सामंतों. प्रमख नागरिकों और वरिष्ठ सवका का सहमति से करने पड़ते थे। महाराणा को सब वर्गों का जो निरंतर स्नेह जार सहयाग मिलता रहा उसका यही रहस्य है। प्रताप को राजतिलक के दिन ही इसके लाभ का अनुभव हुआ।

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